Last reviewed 1 Oct 2026 · Facts as of 1 Oct 2026 · 5 min read
ध्यान दें। संधियों की तिथियाँ पुस्तकों में दिनों/वर्षों में थोड़ी भिन्न मिलती हैं; यहाँ सर्वाधिक प्रचलित तिथियाँ दी गई हैं।
राजपूताना की रियासतें
स्वतंत्रता के समय राजपूताना में कुल 22 इकाइयाँ थीं:
- 19 रियासतें: जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, उदयपुर (मेवाड़), कोटा, बूंदी, झालावाड़, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, सिरोही, किशनगढ़, शाहपुरा, टोंक, भरतपुर, धौलपुर, करौली, अलवर।
- 3 ठिकाने: कुशलगढ़, लावा और नीमराणा।
- 1 केंद्र शासित क्षेत्र: अजमेर-मेरवाड़ा — सीधे अंग्रेज़ों के अधीन (ब्रिटिश भारत का हिस्सा; मुख्य आयुक्त शासित)।
इनमें टोंक अकेली मुस्लिम (नवाबी) रियासत थी; भरतपुर और धौलपुर जाट रियासतें; झालावाड़ झाला राजपूतों की।
ब्रिटिश प्रशासन की व्यवस्था
- 1832 में राजपूताना एजेंसी बनी; ए.जी.जी. (Agent to the Governor General) राजपूताना का सर्वोच्च अंग्रेज अधिकारी था — मुख्यालय अजमेर (ग्रीष्म में माउंट आबू)।
- रियासतों में पॉलिटिकल एजेंट/रेजिडेंट रहते थे।
- 1857 के समय ए.जी.जी.: जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस।
- ब्रिटिश सर्वोच्चता स्वीकार कर रियासतें आंतरिक रूप से स्वायत्त थीं (सहायक संधि जैसी व्यवस्था: सुरक्षा के बदले खिराज/वार्षिक कर, विदेशी संबंध अंग्रेजों के हाथ)।
ब्रिटिश संधियाँ (क्रम)
मराठों और पिंडारियों के आतंक तथा आपसी संघर्षों से परेशान राजपूत राज्यों ने लॉर्ड हेस्टिंग्स (गवर्नर-जनरल) के काल में ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार किया।
| रियासत | संधि वर्ष (प्रचलित) | टिप्पणी |
|---|---|---|
| भरतपुर | 1803 (एक मत) | प्रारंभिक संधि; बाद में दोबारा वार्ता |
| अलवर | 1803 | लासवाड़ी के बाद (लॉर्ड लेक) |
| करौली | 15 नवंबर 1817 | राजपूताना की पहली संधि माना जाता है |
| कोटा | 26 दिसंबर 1817 | झाला जालिम सिंह की भूमिका; महाराव उम्मेद सिंह |
| जोधपुर | 6 जनवरी 1818 | महाराजा मानसिंह |
| उदयपुर (मेवाड़) | 13 जनवरी 1818 | महाराणा भीमसिंह |
| बूंदी | 10 फरवरी 1818 | — |
| बीकानेर | 9 मार्च 1818 | महाराजा सूरत सिंह |
| जयपुर | 15 अप्रैल 1818 | महाराजा जगत सिंह |
| जैसलमेर | 12 दिसंबर 1818 | महारावल मूलराज |
| सिरोही | 1823 | अंतिम प्रमुख रियासत |
(टोंक की संधि 1817 में अमीर खाँ से जुड़ी; डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ आदि ने भी 1818 के आसपास संधियाँ कीं।)
1857 का विद्रोह — राजस्थान में
राजस्थान में अंग्रेजी सेना की छह छावनियाँ थीं — नसीराबाद, नीमच, देवली (कोटा कंटिजेंट), एरिनपुरा, खैरवाड़ा, ब्यावर। रियासतों के राजा अंग्रेजों के साथ रहे, जबकि सैनिकों, जागीरदारों और जनता ने विद्रोह किया।
क्रमिक घटनाएँ
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 28 मई 1857 | नसीराबाद छावनी में विद्रोह — राजस्थान में पहला विद्रोह; सैनिक दिल्ली की ओर चले |
| 3 जून 1857 | नीमच छावनी में विद्रोह; देवली में भी |
| अगस्त 1857 | एरिनपुरा (जोधपुर लीजियन) की सैनिक टुकड़ी का विद्रोह |
| सितंबर 1857 | आउवा (पाली) — बिथौड़ा व चेलावास के युद्ध |
| 15 अक्तूबर 1857 | कोटा में विद्रोह — राज्य की सेना और जनता |
| 1858 | तात्या टोपे का राजस्थान में आगमन (भीलवाड़ा, झालावाड़, टोंक) |
आउवा का विद्रोह (पाली, मारवाड़)
- एरिनपुरा के सैनिक "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी" के नारे के साथ आउवा पहुँचे।
- ठाकुर कुशाल सिंह चांपावत (आउवा) के नेतृत्व में जागीरदारों ने साथ दिया; ए.जी.जी. लॉरेंस और जोधपुर के राजा तख्त सिंह की सेना का सामना।
- 8 सितंबर 1857 — बिथौड़ा का युद्ध: जोधपुर की राजकीय सेना विद्रोहियों से पराजित हुई।
- 18 सितंबर 1857 — चेलावास का युद्ध: ए.जी.जी. लॉरेंस की सेना हारी और जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन मोंक मैसन मारे गए (इसे "काले-गोरे का युद्ध" भी कहा जाता है)।
- बाद में कर्नल होम्स की सेना ने आउवा पर अधिकार किया; कुशाल सिंह ने गढ़ छोड़ा; 1860 में आत्मसमर्पण; मुकदमा चला, पर उन्हें छोड़ दिया गया। सुगाली माता की मूर्ति (आउवा की कुलदेवी) अंग्रेज़ ले गए (अब अजमेर संग्रहालय/जोधपुर में बताई जाती है)।
कोटा का विद्रोह
- कोटा की सेना और जनता ने 15 अक्तूबर 1857 को विद्रोह किया; मेजर बर्टन (पॉलिटिकल एजेंट) और उसके पुत्रों की हत्या।
- नेतृत्व — लाला जयदयाल और मेहराब खान; महाराव रामसिंह द्वितीय को महल में एक प्रकार से घेर लिया गया।
- रॉबर्ट्स की सेना ने मार्च 1858 में कोटा पर पुनः नियंत्रण किया; जयदयाल और मेहराब खान को फाँसी दी गई।
अन्य स्थान
- नसीराबाद के सैनिकों ने दिल्ली पहुँचकर विद्रोह में भाग लिया।
- अजमेर, ब्यावर, खैरवाड़ा (भील कोर) में अंग्रेजों ने स्थिति सँभाली।
- तात्या टोपे — 1858 में राजस्थान में भीलवाड़ा (कोठारी नदी, कुआड़ा का युद्ध — 8 अगस्त 1858), झालावाड़ (शासक पृथ्वी सिंह को हराकर खजाना व तोपें लीं); उन्हें नरवर के मानसिंह नरूका ने धोखे से पकड़वाया (अप्रैल 1859), फाँसी दी गई।
- सिरोही और मेवाड़ में भीलों ने भी हलचल की (सीमित)।