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राजस्थान की रियासतें, ब्रिटिश संधियां एवं 1857 का जन-आंदोलन

स्वतंत्रता के समय राजस्थान की रियासतों की संख्या और स्वरूप, राजस्थान की रियासतों का ब्रिटिश सत्ता से संधि-क्रम (1803–1823), ए.जी.जी. की व्यवस्था, 1857 के विद्रोह में राजस्थान — नसीराबाद, नीमच, एरिनपुरा, आउवा, कोटा, तात्या टोपे — तथा रियासतों की भूमिका, परिणाम और परीक्षा-उपयोगी तथ्य।

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Last reviewed 1 Oct 2026 · Facts as of 1 Oct 2026 · 5 min read

ध्यान दें। संधियों की तिथियाँ पुस्तकों में दिनों/वर्षों में थोड़ी भिन्न मिलती हैं; यहाँ सर्वाधिक प्रचलित तिथियाँ दी गई हैं।

राजपूताना की रियासतें

स्वतंत्रता के समय राजपूताना में कुल 22 इकाइयाँ थीं:

  • 19 रियासतें: जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, उदयपुर (मेवाड़), कोटा, बूंदी, झालावाड़, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, सिरोही, किशनगढ़, शाहपुरा, टोंक, भरतपुर, धौलपुर, करौली, अलवर।
  • 3 ठिकाने: कुशलगढ़, लावा और नीमराणा।
  • 1 केंद्र शासित क्षेत्र: अजमेर-मेरवाड़ा — सीधे अंग्रेज़ों के अधीन (ब्रिटिश भारत का हिस्सा; मुख्य आयुक्त शासित)।

इनमें टोंक अकेली मुस्लिम (नवाबी) रियासत थी; भरतपुर और धौलपुर जाट रियासतें; झालावाड़ झाला राजपूतों की।

ब्रिटिश प्रशासन की व्यवस्था

  • 1832 में राजपूताना एजेंसी बनी; ए.जी.जी. (Agent to the Governor General) राजपूताना का सर्वोच्च अंग्रेज अधिकारी था — मुख्यालय अजमेर (ग्रीष्म में माउंट आबू)।
  • रियासतों में पॉलिटिकल एजेंट/रेजिडेंट रहते थे।
  • 1857 के समय ए.जी.जी.: जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस।
  • ब्रिटिश सर्वोच्चता स्वीकार कर रियासतें आंतरिक रूप से स्वायत्त थीं (सहायक संधि जैसी व्यवस्था: सुरक्षा के बदले खिराज/वार्षिक कर, विदेशी संबंध अंग्रेजों के हाथ)।

ब्रिटिश संधियाँ (क्रम)

मराठों और पिंडारियों के आतंक तथा आपसी संघर्षों से परेशान राजपूत राज्यों ने लॉर्ड हेस्टिंग्स (गवर्नर-जनरल) के काल में ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार किया।

रियासत संधि वर्ष (प्रचलित) टिप्पणी
भरतपुर 1803 (एक मत) प्रारंभिक संधि; बाद में दोबारा वार्ता
अलवर 1803 लासवाड़ी के बाद (लॉर्ड लेक)
करौली 15 नवंबर 1817 राजपूताना की पहली संधि माना जाता है
कोटा 26 दिसंबर 1817 झाला जालिम सिंह की भूमिका; महाराव उम्मेद सिंह
जोधपुर 6 जनवरी 1818 महाराजा मानसिंह
उदयपुर (मेवाड़) 13 जनवरी 1818 महाराणा भीमसिंह
बूंदी 10 फरवरी 1818 —
बीकानेर 9 मार्च 1818 महाराजा सूरत सिंह
जयपुर 15 अप्रैल 1818 महाराजा जगत सिंह
जैसलमेर 12 दिसंबर 1818 महारावल मूलराज
सिरोही 1823 अंतिम प्रमुख रियासत

(टोंक की संधि 1817 में अमीर खाँ से जुड़ी; डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ आदि ने भी 1818 के आसपास संधियाँ कीं।)

1857 का विद्रोह — राजस्थान में

राजस्थान में अंग्रेजी सेना की छह छावनियाँ थीं — नसीराबाद, नीमच, देवली (कोटा कंटिजेंट), एरिनपुरा, खैरवाड़ा, ब्यावर। रियासतों के राजा अंग्रेजों के साथ रहे, जबकि सैनिकों, जागीरदारों और जनता ने विद्रोह किया।

क्रमिक घटनाएँ

तिथि घटना
28 मई 1857 नसीराबाद छावनी में विद्रोह — राजस्थान में पहला विद्रोह; सैनिक दिल्ली की ओर चले
3 जून 1857 नीमच छावनी में विद्रोह; देवली में भी
अगस्त 1857 एरिनपुरा (जोधपुर लीजियन) की सैनिक टुकड़ी का विद्रोह
सितंबर 1857 आउवा (पाली) — बिथौड़ा व चेलावास के युद्ध
15 अक्तूबर 1857 कोटा में विद्रोह — राज्य की सेना और जनता
1858 तात्या टोपे का राजस्थान में आगमन (भीलवाड़ा, झालावाड़, टोंक)

आउवा का विद्रोह (पाली, मारवाड़)

  • एरिनपुरा के सैनिक "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी" के नारे के साथ आउवा पहुँचे।
  • ठाकुर कुशाल सिंह चांपावत (आउवा) के नेतृत्व में जागीरदारों ने साथ दिया; ए.जी.जी. लॉरेंस और जोधपुर के राजा तख्त सिंह की सेना का सामना।
  • 8 सितंबर 1857 — बिथौड़ा का युद्ध: जोधपुर की राजकीय सेना विद्रोहियों से पराजित हुई।
  • 18 सितंबर 1857 — चेलावास का युद्ध: ए.जी.जी. लॉरेंस की सेना हारी और जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन मोंक मैसन मारे गए (इसे "काले-गोरे का युद्ध" भी कहा जाता है)।
  • बाद में कर्नल होम्स की सेना ने आउवा पर अधिकार किया; कुशाल सिंह ने गढ़ छोड़ा; 1860 में आत्मसमर्पण; मुकदमा चला, पर उन्हें छोड़ दिया गया। सुगाली माता की मूर्ति (आउवा की कुलदेवी) अंग्रेज़ ले गए (अब अजमेर संग्रहालय/जोधपुर में बताई जाती है)।

कोटा का विद्रोह

  • कोटा की सेना और जनता ने 15 अक्तूबर 1857 को विद्रोह किया; मेजर बर्टन (पॉलिटिकल एजेंट) और उसके पुत्रों की हत्या।
  • नेतृत्व — लाला जयदयाल और मेहराब खान; महाराव रामसिंह द्वितीय को महल में एक प्रकार से घेर लिया गया।
  • रॉबर्ट्स की सेना ने मार्च 1858 में कोटा पर पुनः नियंत्रण किया; जयदयाल और मेहराब खान को फाँसी दी गई।

अन्य स्थान

  • नसीराबाद के सैनिकों ने दिल्ली पहुँचकर विद्रोह में भाग लिया।
  • अजमेर, ब्यावर, खैरवाड़ा (भील कोर) में अंग्रेजों ने स्थिति सँभाली।
  • तात्या टोपे — 1858 में राजस्थान में भीलवाड़ा (कोठारी नदी, कुआड़ा का युद्ध — 8 अगस्त 1858), झालावाड़ (शासक पृथ्वी सिंह को हराकर खजाना व तोपें लीं); उन्हें नरवर के मानसिंह नरूका ने धोखे से पकड़वाया (अप्रैल 1859), फाँसी दी गई।
  • सिरोही और मेवाड़ में भीलों ने भी हलचल की (सीमित)।

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