Last reviewed 1 Oct 2026 · Facts as of 1 Oct 2026 · 6 min read
ध्यान दें। शासन-काल की तिथियाँ पुस्तकों में कुछ वर्षों के अंतर से मिलती हैं। यहाँ प्रचलित मान्य तिथियाँ दी गई हैं। परीक्षा में क्रम (पहले-बाद में) और प्रमुख उपलब्धि अधिक महत्त्वपूर्ण होती है।
गुर्जर-प्रतिहार
- उत्पत्ति पर मतभेद; मंडोर (जोधपुर) और भीनमाल (जालौर) इनके प्रारंभिक केंद्र रहे। बाद में कन्नौज राजधानी बनी।
- हरिश्चंद्र (ब्राह्मण) को मंडोर शाखा का मूल पुरुष माना जाता है।
- नागभट्ट प्रथम (लगभग 730–756 ई.) — अरब आक्रमणकारियों को पराजित किया (सिंध की ओर से आने वाले जुनैद/तमीन की सेनाएँ); इसलिए "अरबों के विरुद्ध दीवार" कहा गया।
- वत्सराज — कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष (प्रतिहार–पाल–राष्ट्रकूट) आरंभ।
- नागभट्ट द्वितीय — कन्नौज को राजधानी बनाया।
- मिहिर भोज (लगभग 836–885 ई.) — सबसे शक्तिशाली; "आदिवराह" की उपाधि; साम्राज्य हिमालय से नर्मदा तक; अरब यात्री सुलेमान ने इसे अरबों का शत्रु व शक्तिशाली बताया।
- महेंद्रपाल प्रथम — कवि राजशेखर इनके दरबार में थे।
चौहान (चाहमान)
शाकंभरी (सांभर) और अजमेर के चौहान
- संस्थापक वासुदेव (लगभग छठी सदी; सांभर झील की स्थापना की परंपरा इन्हीं से जुड़ी है)।
- अजयराज (12वीं सदी) — अजयमेरु (अजमेर) नगर और तारागढ़ की स्थापना।
- अर्णोराज — तुर्क आक्रमणकारियों को पराजित किया; आनासागर झील का निर्माण।
- विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) — दिल्ली तक विस्तार; संस्कृत के संरक्षक; "कटिबंधु" उपाधि; अजमेर में संस्कृत पाठशाला (जो बाद में ढाई दिन का झोंपड़ा बनी); स्वयं हरकेलि नाटक के रचयिता।
- पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1177–1192) — तराइन का प्रथम युद्ध (1191) — मोहम्मद गौरी पराजित; तराइन का द्वितीय युद्ध (1192) — पृथ्वीराज पराजित; भारत में तुर्क सत्ता की नींव। दरबारी कवि: चंदबरदाई, जयानक।
रणथंभौर के चौहान
- संस्थापक गोविंदराज (पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र) माने जाते हैं।
- हम्मीर देव (लगभग 1282–1301) — अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध; 1301 में रणथंभौर का साका; शरणागत मीर मुहम्मद शाह (महिमा शाह) को आश्रय देने के कारण युद्ध; "हम्मीर हठ" की कहावत।
जालौर के चौहान
- कान्हड़देव — 1311 में अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध; जालौर का साका; ग्रंथ कान्हड़दे प्रबंध (पद्मनाभ)।
गुहिल–सिसोदिया (मेवाड़)
| शासक | उपलब्धि |
|---|---|
| गुहिल / गुहादित्य | मेवाड़ में गुहिल वंश के संस्थापक माने जाते हैं |
| बप्पा रावल (लगभग 8वीं सदी) | नागदा में आरंभ; एकलिंगजी के भक्त; चित्तौड़ पर अधिकार (मौर्य शासक मान मोरी से) |
| अल्लट (आलू रावल) | आहड़ को राजधानी बनाया |
| जैत्रसिंह (13वीं सदी) | इल्तुतमिश के नागदा पर आक्रमण के बाद भी सत्ता बनाए रखी; मेवाड़ को शक्तिशाली बनाया |
| रावल रतनसिंह | 1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया; पहला साका; पद्मिनी की कथा (जायसी का पद्मावत, ऐतिहासिकता पर मतभेद) |
| राणा हम्मीर (14वीं सदी) | सिसोदिया शाखा के संस्थापक माने जाते हैं; मेवाड़ को पुनः सशक्त किया; "विषम घाटी पंचानन" |
| राणा कुंभा (1433–1468) | सारंगपुर (1437) में महमूद खिलजी पर विजय; विजय स्तंभ (कीर्ति स्तंभ), चित्तौड़ (विजय की स्मृति में, लगभग 1440–48); कुंभलगढ़ (1458) तथा परंपरा के अनुसार 32 दुर्गों व अनेक मंदिरों का निर्माण; स्वयं कवि व संगीतज्ञ; ग्रंथ संगीतराज, सूड प्रबंध; शिल्पी मंडन; उपाधियाँ: "हिंदू सुरत्राण", "राजगुरु", "तोडरमल", "चापगुरु" |
| राणा सांगा (संग्राम सिंह, 1509–1528) | खातोली (1517) में इब्राहिम लोदी को हराया; बाड़ी (धौलपुर, 1518); खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527) — बाबर से पराजित; राजपूत संघ का नेतृत्व; शरीर पर 80 घाव |
| महाराणा उदयसिंह (1537–1572) | उदयपुर नगर की स्थापना (1559 के आसपास); 1568 में अकबर द्वारा चित्तौड़ पर आक्रमण; तीसरा साका (जयमल-पत्ता) |
| महाराणा प्रताप (1572–1597) | हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576) — अकबर की ओर से मानसिंह और आसफ खाँ; घोड़ा चेतक; दिवेर का युद्ध (1582) में मुग़ल सेना पराजित; राजधानी चावंड; मृत्यु 1597 (चावंड) |
| अमर सिंह प्रथम | 1615 में जहाँगीर से संधि (मेवाड़-मुग़ल संघर्ष समाप्त) |
| महाराणा राजसिंह (1652–1680) | औरंगज़ेब के विरुद्ध दुर्गादास व अजीत सिंह की सहायता; राजसमंद झील (राज प्रशस्ति); रूपनगढ़ की राजकुमारी (चारुमति) की कथा |