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राजस्थान के इतिहास के प्रमुख स्रोत

राजस्थान के इतिहास को जानने के साधन — पुरातात्विक स्रोत (कालीबंगा, आहड़, गिलूंड, बागोर, गणेश्वर, बैराठ, नगर, रंगमहल आदि), शिलालेख और प्रशस्तियाँ, सिक्के, साहित्यिक स्रोत (रासो, ख्यात, वंशावली, वीर विनोद, टॉड का इतिहास), विदेशी यात्रियों के विवरण, तथा पुरालेखीय सामग्री। साथ में "राजस्थान" नाम का इतिहास और परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य।

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Last reviewed 1 Oct 2026 · Facts as of 1 Oct 2026 · 7 min read

ध्यान दें। तिथियाँ और उत्खननकर्ताओं के नाम अलग-अलग पुस्तकों में थोड़े भिन्न मिलते हैं। यहाँ वे तथ्य दिए गए हैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं में सामान्यतः स्वीकार किए जाते हैं; जहाँ मतभेद है वहाँ "माना जाता है" लिखा गया है।

इतिहास के स्रोत — वर्गीकरण

किसी क्षेत्र का इतिहास पुरातात्विक, साहित्यिक, पुरालेखीय, मुद्रा-संबंधी और विदेशी विवरणों के आधार पर लिखा जाता है। राजस्थान में पाषाण युग से लेकर रियासतों के काल तक के साक्ष्य मिलते हैं।

वर्ग उदाहरण
पुरातात्विक उत्खनित स्थल, मृद्भांड, औजार, भवन, मूर्तियाँ
अभिलेख (शिलालेख, ताम्रपत्र) घोसुंडी, नांदसा, बिजौलिया, राज प्रशस्ति
सिक्के कुषाण, यौधेय, मालव सिक्के; रियासती सिक्के
साहित्यिक पृथ्वीराज रासो, नैणसी री ख्यात, वीर विनोद, वंश भास्कर
विदेशी विवरण ह्वेनसांग, अलबरूनी, टॉड, अबुल फज़ल का आइन-ए-अकबरी
पुरालेख (अभिलेखागार) बहियाँ, पट्टे-परवाने, खरीते, फरमान

"राजस्थान" नाम का इतिहास

  • माना जाता है कि "राजस्थानीय" शब्द का सबसे पुराना प्रयोग वसंतगढ़ (सिरोही) के लगभग 625 ई. के शिलालेख में मिलता है।
  • मध्यकाल में इस क्षेत्र के लिए "रायथान" शब्द प्रचलित रहा।
  • जॉर्ज थॉमस (1800 ई.) ने इसे "राजपूताना" कहा; कर्नल जेम्स टॉड ने अपने ग्रंथ में इसे "राजस्थान" तथा "रायथान" कहा।
  • स्वतंत्रता के बाद 30 मार्च 1949 को वृहद् राजस्थान बना; 1 नवंबर 1956 को वर्तमान स्वरूप मिला।

पुरातात्विक स्रोत

प्रमुख उत्खनित स्थल

स्थल ज़िला / नदी महत्व
कालीबंगा हनुमानगढ़ (घग्घर, प्राचीन सरस्वती-दृषद्वती क्षेत्र) हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख केंद्र; जुते हुए खेत, अग्निकुंड/हवन वेदियाँ, दो टीले (गढ़ी व निचला नगर); "काले रंग की चूड़ियाँ" (अर्थ: कालीबंगा); पहली पहचान अमलानंद घोष (1952); बड़ा उत्खनन बी.बी. लाल और बी.के. थापर (1961–69)
आहड़ (आयड़) उदयपुर (आयड़/बेड़च नदी) ताम्रयुगीन संस्कृति; "ताम्रवती नगरी"; मकान पत्थर के; बड़े भंडारण पात्र (गोरे व कोठे); उत्खनन में अक्षय कीर्ति व्यास, आर.सी. अग्रवाल, एच.डी. सांकलिया के नाम जुड़े हैं
गिलूंड राजसमंद (बनास) आहड़ संस्कृति का स्थल; पक्की ईंटों के प्रयोग के साक्ष्य; उत्खनन बी.बी. लाल (1959–60)
बागोर भीलवाड़ा (कोठारी नदी) पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्यों में गिना जाता है; मध्यपाषाण संस्कृति; उत्खनन वी.एन. मिश्र (1960 के दशक)
गणेश्वर सीकर (कांतली नदी) ताम्र-संस्कृति का केंद्र, "ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी" कहा जाता है; तांबे के औजार व तीर; खोज रतनचंद्र अग्रवाल (1970 के दशक)
बैराठ (विराटनगर) जयपुर मौर्यकाल; अशोक का भाब्रू (बैराठ) शिलालेख (अब कोलकाता में); बौद्ध मंदिर के अवशेष; महाभारतकालीन विराट की राजधानी माना जाता है; खोज दयाराम साहनी
नगर (कर्कोट नगर) टोंक मालव जनपद की राजधानी; मालवों के सिक्के
रंगमहल हनुमानगढ़ (घग्घर) कुषाणकालीन मृणमूर्तियाँ व सिक्के
सुनारी झुंझुनूँ लोहे के प्रयोग के प्राचीन साक्ष्य
जोधपुरा जयपुर लौह-पूर्व व शुंग-कुषाणकालीन अवशेष
नगरी (माध्यमिका) चित्तौड़गढ़ शिबि जनपद की राजधानी; पाषाण निर्मित अवशेष
ओझियाना भीलवाड़ा आहड़-जैसी संस्कृति के साक्ष्य
तिलवाड़ा बाड़मेर (लूनी) मध्यपाषाण-ताम्र पाषाण साक्ष्य

परीक्षा सूत्र: हड़प्पा → कालीबंगा; ताम्र → आहड़ व गणेश्वर; पशुपालन → बागोर; मौर्य/बौद्ध → बैराठ; लोहा → सुनारी।

कालीबंगा के प्रमुख तथ्य

  • जुते हुए खेत का प्राचीनतम साक्ष्य (प्री-हड़प्पा स्तर) — दो फसलें एक साथ बोने की पद्धति।
  • सात अग्निवेदियाँ, पक्के मकानों के स्थान पर कच्ची ईंटें; पक्की ईंट का नालियों व कुओं में प्रयोग।
  • मुहरें व मुद्राएँ मिलीं; लिपि अभी तक अपठित।
  • पूर्व-हड़प्पा और हड़प्पा, दोनों स्तर।

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