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राजस्थान की प्रमुख चित्रकलाएं एवं हस्तशिल्प

राजस्थानी चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ — मेवाड़, मारवाड़, बूंदी, कोटा, किशनगढ़ (बणी-ठणी), जयपुर (आमेर), बीकानेर, अलवर, जैसलमेर, नाथद्वारा (पिछवाई) और फड़ चित्रण — उनके प्रमुख चित्रकार और विशेषताएँ; हस्तशिल्प (ब्लू पॉटरी, थेवा, कठपुतली, मीनाकारी, कुंदन, लाख, बंधेज, ब्लॉक प्रिंट, चमड़े की मोजड़ी, पीतल-काष्ठ, गलीचे, पत्थर शिल्प) और उनके केंद्र।

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Last reviewed 1 Oct 2026 · Facts as of 1 Oct 2026 · 5 min read

ध्यान दें। चित्रकारों और शैलियों के काल में स्रोतों के अनुसार थोड़ा अंतर मिलता है। परीक्षा में शैली–स्थान–चित्रकार–विशेषता का मिलान पूछा जाता है।

राजस्थानी चित्रकला का परिचय

  • राजस्थानी चित्रकला (राजपूत चित्रकला) का विकास 16वीं से 19वीं सदी में रियासतों के संरक्षण में हुआ।
  • आनंद कुमारस्वामी ने 1916 में "राजपूत पेंटिंग" नाम से इसे अलग शैली के रूप में पहचाना।
  • विषय: रागमाला, बारहमासा, कृष्ण-लीला (गीत गोविंद), रामायण-महाभारत, दरबारी दृश्य, शिकार, श्रृंगार, नायिका-भेद, लोक कथाएँ (ढोला-मारू)।
  • विशेषताएँ: चटख रंग, प्रकृति का अंकन, प्रेम और भक्ति, रेखा की प्रधानता, लघु चित्र (मिनिएचर)।
  • रंग: पत्थर, फूलों, पत्तियों और धातुओं से बने प्राकृतिक रंग; सोना-चाँदी का प्रयोग।
  • प्रमुख स्कूल (चार मुख्य खंड): मेवाड़, मारवाड़, हाड़ौती, ढूँढाड़ आदि।

प्रमुख चित्र शैलियाँ

1. मेवाड़ शैली (उदयपुर, चित्तौड़गढ़, नाथद्वारा)

  • सबसे प्राचीन शैली — लगभग 1260 ई. का ग्रंथ "श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि" (मेवाड़ के तेजसिंह के काल, आहड़; चित्रकार कमलचंद) सबसे प्राचीन सचित्र ग्रंथ माना जाता है।
  • कुंभा काल: सुप्रासनाहचरियम।
  • उदयपुर शैली: चित्रकार निसारदीन (निसारुद्दीन), साहबदीन — रागमाला (चावंड, 1605) (निसारदीन ने राणा अमर सिंह के काल में चावंड में बनाई), राग माला, रसिक प्रिया, गीत गोविंद।
  • विशेषताएँ: लाल-पीले रंग की प्रधानता; भक्ति और कृष्ण लीला; मोटी आँखें; हाथी, महल, पुष्प।
  • नाथद्वारा शैली — पिछवाई चित्र (श्रीनाथजी की मूर्ति के पीछे का कपड़ा-चित्र); कृष्ण-लीलाएँ, गोपियाँ, गायें, कमल; हरे-पीले रंग; चित्रकार — खूबराम, घासीराम।
  • देवगढ़ शैली (राजसमंद) — पिछवाई-जैसी, बारीक अलंकरण ( चित्रकार बगता, कंवला)।

2. मारवाड़ शैली (जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर, किशनगढ़ — भिन्न-भिन्न)

  • जोधपुर शैली — राव मालदेव के समय चित्रकार वीरजी ने "रागमाला" (1623, पाली) बनाई; महाराजा अजीत सिंह, मानसिंह के काल में नाथ संप्रदाय के चित्र।
  • विशेषताएँ: ऊँटों, घोड़ों की प्रधानता; पुरुष लंबी मूँछें, बादाम-जैसी आँखें; लाल-पीले रंग; लंबे साफे, अंगरखा।
  • चित्रकार: भाटी चित्रकार, वीरजी, नाथा, किशनदास, शिवदास।
  • उपविभाग: नागौर शैली — सजीले रंग, बारीक पोशाक।
  • जैसलमेर शैली — मूमल (मूमल-महेंद्र) की प्रेम कथा के चित्र; लंबी आँखें, मुगल-प्रभाव कम।
  • बीकानेर शैली — मुग़ल प्रभाव; उस्ता कला और मथेरन (भित्ति-चित्र)।

3. बूंदी शैली (हाड़ौती — बूंदी)

  • रागमाला (1591, चुनार में चित्रकार रामलाल, महाराजा भोज)।
  • विशेषताएँ: हरे रंग का अधिक प्रयोग, वर्षा, बादल, प्रकृति और वन्य-जीवन; सघन वनस्पति, जल-चित्रण।
  • चित्रकार: सुरजन सिंह के काल में अहमद अली, रामलाल, श्रीकिशन, साधुराम।
  • भित्ति चित्र: बूंदी का चित्रशाला (उम्मेद महल) — उम्मेद सिंह के समय की भित्ति-चित्र-दीर्घा।

4. कोटा शैली

  • बूंदी शैली से विकसित; राव माधो सिंह के समय आरंभ; महाराव रामसिंह के काल में चरम; शिकार चित्र, हाथी।
  • विशेषता: "शिकार के चित्र", पशु-पक्षी, जंगल; नीले-पीले रंग।
  • चित्रकार: रघुनाथ, डालू, लच्छीराम।

5. किशनगढ़ शैली (बणी-ठणी)

  • राजा सावंत सिंह (नागरीदास) के काल में चरम; चित्रकार निहालचंद।
  • बणी-ठणी — राधा-कृष्ण का चित्र, सुंदर नायिका — "भारत की मोनालिसा" कही जाती है।
  • विशेषताएँ: लंबी, नुकीली आँखें, पतली नाक, पतले होंठ, झुकी हुई ठोड़ी; कमल जैसी आँखें; नीला-सफेद।
  • बणी-ठणी पर डाक टिकट (1973); नागरीदास की प्रेयसी "बणी-ठणी" (दासी विष्णुप्रिया)।

6. जयपुर (ढूँढाड़ / आमेर) शैली

  • मुग़ल प्रभाव सर्वाधिक; सवाई जयसिंह द्वितीय, प्रताप सिंह के काल में उत्कर्ष; चित्रकार साहिबराम (सवाई ईश्वरी सिंह का आदमकद चित्र)।
  • विशेषताएँ: बारीक आभूषण, पोशाक, वास्तु; राधा-कृष्ण, रास, दरबारी दृश्य।
  • आमेर शैली (मानसिंह के काल में); शेखावाटी के भित्ति-चित्र।

7. अलवर शैली

  • राव बख्तावर सिंह और विनय सिंह के काल में; मुग़ल और जयपुर शैली का समन्वय; हाथी दाँत पर चित्रण; योगासन, वेश्याओं के चित्र; चित्रकार बलदेव, डालचंद, गुलाम अली।

8. फड़ चित्रण

  • लंबे कपड़े पर लोक-देवता की गाथा चित्रित; भीलवाड़ा के शाहपुरा में जोशी परिवार — श्रीलाल जोशी; पाबूजी की फड़ और देवनारायण की फड़।
  • भोपा फड़ को खोलकर रावणहत्था/जंतर के साथ गाते हैं।

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