Last reviewed 1 Oct 2026 · 13 min read
संधि क्या है?
संधि का अर्थ है मेल। जब दो वर्ण (ध्वनियाँ) पास-पास आते हैं तो उनके मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है, उसे संधि कहते हैं।
- संधि-विच्छेद (विग्रह) — संधि से बने शब्द को अलग-अलग करना: विद्यालय = विद्या + आलय।
- संधि करना — दो शब्दों को जोड़कर एक करना: सूर्य + उदय = सूर्योदय।
- संधि में पहले शब्द के अंतिम वर्ण और दूसरे शब्द के आरंभिक वर्ण में परिवर्तन होता है।
संधि के तीन भेद
| भेद | मेल किनका | उदाहरण |
|---|---|---|
| स्वर संधि | स्वर + स्वर | विद्या + आलय = विद्यालय |
| व्यंजन संधि | व्यंजन + स्वर / व्यंजन + व्यंजन / स्वर + व्यंजन | जगत् + ईश = जगदीश |
| विसर्ग संधि | विसर्ग (ः) + स्वर / व्यंजन | निः + चल = निश्चल |
संयोग में केवल दो व्यंजन पास-पास आते हैं और उनका रूप नहीं बदलता (जैसे प्र + श्न, अ + ब + ज), जबकि संधि में ध्वनि बदलती है। संधि के लिए शब्दों का पास-पास आना और विकार होना आवश्यक है।
स्वर संधि
दो स्वरों के मेल से जो परिवर्तन हो उसे स्वर संधि कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं।
1. दीर्घ संधि
नियम: सवर्ण (समान) ह्रस्व या दीर्घ स्वरों के मेल से दीर्घ स्वर बन जाता है।
| मेल | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|
| अ/आ + अ/आ | आ | धर्म + अर्थ = धर्मार्थ; विद्या + आलय = विद्यालय; महा + आत्मा = महात्मा; सत्य + अर्थी = सत्यार्थी |
| इ/ई + इ/ई | ई | रवि + इंद्र = रवींद्र; गिरि + ईश = गिरीश; मही + ईश = महीश; श्री + ईश = श्रीश |
| उ/ऊ + उ/ऊ | ऊ | भानु + उदय = भानूदय; सु + उक्ति = सूक्ति; वधू + उत्सव = वधूत्सव; लघु + ऊर्मि = लघूर्मि |
| ऋ + ऋ | ऋ | पितृ + ऋण = पितृण |
2. गुण संधि
नियम: अ या आ के बाद इ/ई आए तो 'ए'; उ/ऊ आए तो 'ओ'; ऋ आए तो 'अर्' हो जाता है।
| मेल | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|
| अ/आ + इ/ई | ए | देव + इंद्र = देवेंद्र; नर + ईश = नरेश; महा + ईश = महेश; सुर + ईश = सुरेश |
| अ/आ + उ/ऊ | ओ | सूर्य + उदय = सूर्योदय; महा + उत्सव = महोत्सव; चंद्र + उदय = चंद्रोदय; समुद्र + ऊर्मि = समुद्रोर्मि |
| अ/आ + ऋ | अर् | देव + ऋषि = देवर्षि; महा + ऋषि = महर्षि; सप्त + ऋषि = सप्तर्षि; राज + ऋषि = राजर्षि |
3. वृद्धि संधि
नियम: अ या आ के बाद ए/ऐ आए तो 'ऐ'; ओ/औ आए तो 'औ' हो जाता है।
| मेल | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|
| अ/आ + ए/ऐ | ऐ | एक + एक = एकैक; सदा + एव = सदैव; तथा + एव = तथैव; महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य |
| अ/आ + ओ/औ | औ | वन + औषधि = वनौषधि; महा + औषध = महौषध; परम + औषध = परमौषध; जल + ओघ = जलौघ |
4. यण संधि
नियम: इ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद कोई असमान (भिन्न) स्वर आए तो इ/ई → य्, उ/ऊ → व्, ऋ → र् हो जाता है और बाद वाला स्वर मात्रा बनकर जुड़ जाता है।
| मेल | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|
| इ/ई + असमान स्वर | य् | अति + आचार = अत्याचार; इति + आदि = इत्यादि; यदि + अपि = यद्यपि; प्रति + एक = प्रत्येक; नदी + अर्पण = नद्यर्पण |
| उ/ऊ + असमान स्वर | व् | अनु + अय = अन्वय; सु + आगत = स्वागत; मधु + आलय = मध्वालय; अनु + एषण = अन्वेषण |
| ऋ + असमान स्वर | र् | पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा; मातृ + आनंद = मात्रानंद; पितृ + अनुमति = पित्रनुमति |
5. अयादि संधि
नियम: ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई स्वर आए तो — ए → अय्, ऐ → आय्, ओ → अव्, औ → आव् हो जाता है।
| मेल | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|
| ए + स्वर | अय् | ने + अन = नयन; शे + अन = शयन; चे + अन = चयन |
| ऐ + स्वर | आय् | नै + अक = नायक; गै + अक = गायक; गै + इका = गायिका |
| ओ + स्वर | अव् | पो + अन = पवन; भो + अन = भवन; पो + इत्र = पवित्र |
| औ + स्वर | आव् | पौ + अक = पावक; नौ + इक = नाविक; भौ + उक = भावुक; पौ + अन = पावन |
- अ/आ + अ/आ → आ, इ/ई + इ/ई → ई, उ/ऊ + उ/ऊ → ऊ : दीर्घ
- अ/आ के बाद इ, उ, ऋ → ए, ओ, अर् : गुण
- अ/आ के बाद ए, ऐ, ओ, औ → ऐ, औ : वृद्धि
- इ, उ, ऋ के बाद भिन्न स्वर → य, व, र : यण
- ए, ऐ, ओ, औ के बाद स्वर → अय, आय, अव, आव : अयादि
व्यंजन संधि
व्यंजन का स्वर या व्यंजन से मेल होने पर जो परिवर्तन हो, वह व्यंजन संधि है।
प्रमुख नियम
1. वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में बदलना: यदि क्, च्, ट्, त्, प् के बाद कोई स्वर या वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण या य, र, ल, व, ह आए, तो वे अपने वर्ग के तीसरे वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्) में बदल जाते हैं।
| क् → ग् | दिक् + गज = दिग्गज; वाक् + ईश = वागीश; दिक् + अंबर = दिगंबर |
|---|---|
| ट् → ड् | षट् + आनन = षडानन; षट् + दर्शन = षड्दर्शन |
| त् → द् | जगत् + ईश = जगदीश; सत् + आचार = सदाचार; उत् + घाटन = उद्घाटन; तत् + अनुसार = तदनुसार; सत् + गति = सद्गति |
| प् → ब् | अप् + ज = अब्ज; अप् + धि = अब्धि |
2. वर्ग के पहले वर्ण का पाँचवें (नासिक्य) में बदलना: यदि क्, च्, ट्, त्, प् के बाद न या म आए तो वे अपने वर्ग के पाँचवें वर्ण में बदल जाते हैं।
- वाक् + मय = वाङ्मय; षट् + मास = षण्मास; जगत् + नाथ = जगन्नाथ; उत् + नति = उन्नति; उत् + मत्त = उन्मत्त; सत् + मार्ग = सन्मार्ग।
3. 'त्' संबंधी नियम:
- त् + च/छ → च् : उत् + चारण = उच्चारण; सत् + चरित्र = सच्चरित्र।
- त् + ज/झ → ज् : सत् + जन = सज्जन; उत् + ज्वल = उज्ज्वल।
- त् + ट/ड → ट्/ड् : तत् + टीका = तट्टीका; उत् + डयन = उड्डयन।
- त् + ल → ल् : उत् + लेख = उल्लेख; तत् + लीन = तल्लीन।
- त् + श → च्छ : उत् + श्वास = उच्छ्वास; सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र।
- त् + ह → द्ध : उत् + हार = उद्धार; उत् + हरण = उद्धरण।
4. 'म्' संबंधी नियम: म् के बाद कोई व्यंजन आए तो म् प्रायः अनुस्वार (ं) हो जाता है (या उस वर्ग के पंचम वर्ण में):
- सम् + सार = संसार; सम् + गम = संगम; सम् + योग = संयोग; सम् + कल्प = संकल्प; सम् + तोष = संतोष; किम् + चित् = किंचित्; सम् + वाद = संवाद।
- म् + य, र, ल, व, श, ष, स, ह के बाद म् → अनुस्वार (केवल): सम् + रक्षण = संरक्षण; सम् + हार = संहार।
5. 'छ' संबंधी नियम: ह्रस्व स्वर के बाद छ आए तो छ से पहले 'च्' जुड़ जाता है: वि + छेद = विच्छेद; अनु + छेद = अनुच्छेद; परि + छेद = परिच्छेद; आ + छादन = आच्छादन; स्व + छंद = स्वच्छंद; संधि + छेद = संधिच्छेद।
6. 'स' का 'ष' होना (षत्व): अ, आ के अतिरिक्त स्वर या कवर्ग के बाद 'स' आए तो 'ष' हो जाता है: अभि + सेक = अभिषेक; सु + सुप्ति = सुषुप्ति; वि + सम = विषम; नि + सिद्ध = निषिद्ध; अनु + संग = अनुषंग।
7. 'न' का 'ण' होना (णत्व): ऋ, र, ष के बाद 'न' आए तो 'ण' हो जाता है, बीच में स्वर, कवर्ग, पवर्ग, य, व, ह, अनुस्वार हो तो भी: परि + नाम = परिणाम; प्र + मान = प्रमाण; राम + अयन = रामायण; भूष् + अन = भूषण; नार + अयन = नारायण; प्र + नाम = प्रणाम।
8. स्वर + छ और अन्य उदाहरण: अभि + सार = अभिसार; उत् + स्थान = उत्थान; उत् + स्थित = उत्थित ('स्' का लोप); सम् + चार = संचार; दुः + जन = दुर्जन (यह विसर्ग संधि है)।
'त्' संबंधी नियमों का सार
- 'त्' के बाद स्वर/ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, व → द्
- 'त्' के बाद च, छ → च्; ज, झ → ज्; ट, ठ → ट्; ड, ढ → ड्; ल → ल्; श → च्छ; ह → द्ध
- 'त्' के बाद न, म → न् (जगन्नाथ, उन्मत्त)