Last reviewed 1 Oct 2026 · 10 min read
वर्ण और वर्णमाला
वर्ण भाषा की वह सबसे छोटी ध्वनि है जिसके और टुकड़े नहीं हो सकते — जैसे अ, क, म। वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की लिपि देवनागरी है, जो बाएँ से दाएँ लिखी जाती है और जिसकी विशेषता यह है कि जैसा बोला जाता है, लगभग वैसा ही लिखा जाता है।
- मानक हिंदी वर्णमाला में 11 स्वर और 33 व्यंजन (मूल व्यंजन) माने जाते हैं। इनके अतिरिक्त अनुस्वार (अं) और विसर्ग (अः) अयोगवाह कहलाते हैं; ड़, ढ़ उत्क्षिप्त व्यंजन हैं; क्ष, त्र, ज्ञ, श्र संयुक्त व्यंजन हैं।
- वर्णों की गिनती में मतभेद पाया जाता है। परीक्षा में प्रश्न के संदर्भ के अनुसार उत्तर दें; सामान्यतः स्वर 11 (अ से औ तक) और व्यंजन 33 (क से ह तक, संयुक्त वर्णों और ड़, ढ़ के बिना) पूछे जाते हैं।
स्वर
स्वर वे वर्ण हैं जिनका उच्चारण बिना किसी दूसरे वर्ण की सहायता के होता है और जो व्यंजनों के उच्चारण में सहायक हैं।
| ह्रस्व स्वर (एक मात्रा का समय) | दीर्घ स्वर (दो मात्रा का समय) |
|---|---|
| अ, इ, उ, ऋ | आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ |
- ह्रस्व स्वर — अ, इ, उ, ऋ (इन्हें मूल स्वर भी कहते हैं)।
- दीर्घ स्वर — आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।
- प्लुत स्वर — जिनके उच्चारण में तीन मात्राओं का समय लगे। जैसे — ओ३म्, हे राम३! (किसी को दूर से पुकारने में)।
- संधि स्वर (मिश्र स्वर) — ए, ऐ, ओ, औ; ये दो स्वरों के मेल से बने हैं। सजातीय (सवर्ण) स्वरों के मेल से बने दीर्घ स्वर: आ, ई, ऊ।
- उच्चारण में मुख की स्थिति से: विवृत (मुँह पूरा खुले) — आ; अर्द्ध विवृत — अ, ऐ, औ; संवृत (मुँह कम खुले) — इ, ई, उ, ऊ; अर्द्ध संवृत — ए, ओ।
- जिह्वा के भाग से: अग्र स्वर — इ, ई, ए, ऐ; मध्य स्वर — अ; पश्च स्वर — आ, उ, ऊ, ओ, औ।
- ओष्ठ की आकृति से: वर्तुल (गोलाकार) — उ, ऊ, ओ, औ; अवर्तुल — बाकी स्वर।
मात्राएँ
स्वर जब व्यंजन के साथ जुड़ते हैं, तो उनका रूप बदल जाता है — इसे मात्रा कहते हैं। 'अ' की कोई मात्रा नहीं होती (व्यंजन में स्वयं निहित रहता है)।
| स्वर | मात्रा | उदाहरण |
|---|---|---|
| अ | (कोई नहीं) | क |
| आ | ा | का |
| इ | ि | कि |
| ई | ी | की |
| उ | ु | कु |
| ऊ | ू | कू |
| ऋ | ृ | कृ |
| ए | े | के |
| ऐ | ै | कै |
| ओ | ो | को |
| औ | ौ | कौ |
'ऋ' हिंदी में ri की तरह बोला जाता है (जैसे ऋषि, कृपा, गृह), पर यह स्वर है और इसका उच्चारण स्थान मूर्धा माना जाता है।
व्यंजन
व्यंजन वे वर्ण हैं जिनका उच्चारण स्वर की सहायता से होता है। प्रत्येक व्यंजन में 'अ' स्वर मिला रहता है; इसीलिए 'क' = क् + अ। जब केवल व्यंजन लिखना हो तो उसमें हलंत (्) लगाते हैं — जैसे क्।
1. स्पर्श व्यंजन (25)
इन्हें वर्गीय व्यंजन भी कहते हैं, क्योंकि ये पाँच वर्गों में बँटे हैं और इनके उच्चारण में जीभ मुख के किसी भाग को स्पर्श करती है।
| वर्ग | वर्ण | उच्चारण स्थान |
|---|---|---|
| क वर्ग (कंठ्य) | क, ख, ग, घ, ङ | कंठ |
| च वर्ग (तालव्य) | च, छ, ज, झ, ञ | तालु |
| ट वर्ग (मूर्धन्य) | ट, ठ, ड, ढ, ण | मूर्धा |
| त वर्ग (दंत्य) | त, थ, द, ध, न | दाँत |
| प वर्ग (ओष्ठ्य) | प, फ, ब, भ, म | होंठ |
- प्रत्येक वर्ग का पाँचवाँ वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) नासिक्य (अनुनासिक) कहलाता है, क्योंकि उसका उच्चारण नाक की सहायता से होता है।
2. अंतःस्थ व्यंजन (4)
य, र, ल, व — ये स्वरों और व्यंजनों के बीच में स्थित हैं (अंतः = बीच, स्थ = स्थित)। इन्हें अर्द्धस्वर भी कहते हैं (य और व)।
- य — तालव्य; र — मूर्धन्य (वर्त्स्य); ल — दंत्य (पार्श्विक); व — दंतोष्ठ्य।
3. ऊष्म व्यंजन (4)
श, ष, स, ह — इनके उच्चारण में साँस की गर्मी (ऊष्मा) निकलती है।
- श — तालव्य; ष — मूर्धन्य; स — दंत्य; ह — कंठ्य (या स्वरयंत्रीय)।
4. संयुक्त व्यंजन (4)
जो व्यंजन दो या अधिक व्यंजनों के मेल से बने हों:
- क्ष = क् + ष (क्षमा, रक्षा)
- त्र = त् + र (पत्र, मित्र)
- ज्ञ = ज् + ञ (ज्ञान, विज्ञान)
- श्र = श् + र (श्रम, श्रवण)
5. उत्क्षिप्त (द्विगुण) व्यंजन
ड़, ढ़ — इनके उच्चारण में जीभ की नोक ऊपर उठकर झटके से नीचे आती है। ये शब्द के आरंभ में नहीं आते — जैसे पेड़, सड़क, पढ़ाई, गढ़। (शब्द के आरंभ में केवल ड, ढ आते हैं — जैसे डमरू, ढक्कन।)
6. आगत (नुक्ता वाले) वर्ण
अरबी–फ़ारसी और अँग्रेज़ी से आए शब्दों की ध्वनियों के लिए नुक्ता (़) का प्रयोग होता है: क़, ख़, ग़, ज़, फ़ — जैसे क़ानून, ख़बर, ग़म, ज़रूरत, फ़ल (≠ फल)। अँग्रेज़ी के लिए ऑ (ɔ) — जैसे डॉक्टर, कॉलेज, बॉल।